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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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अथ भूमिका प्रारम्भः ।

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सत्यलोकके सत्यपुरुष, ज्ञानी सोइ अनूप ।
जोगजीत प्रभु आप हैं, आदिरूप अनुरूप ॥ १ ॥
सत्यनाम सतसुकृत्य विश्व, अदली आदि अकाम ।
अजर अचिन्त पुरुष अहै, नाम मुनीन्द्र अनाम ॥ २ ॥
करुणामय कवीर गुरु, धर्मदासके पीर ।
देह धरि आय जगतमें, साइ विदेह शरीर ॥ ३ ॥
पच्छा पच्छमें जग फँसी, भूल सत्यकी राह ।
दोउ दीनके जीवको, आय लगावन थाह ॥ ४ ॥
सत्य पंथ परगटकरी, स्वसम्बेदकी रीति ।
भूल पाखण्ड छुडाइके, सत्यलखायीनीति ॥ ५ ॥
नीति लखायी सत्यकी, वचन वंश परकाश ।
वचन मानु सो वंश है, प्रगट कहा अविनाश ॥ ६ ॥
नाशमान सब जगत है, जहाँ लग दृष्टि-विकास ।
वचन वंशकी शरणते, होय सत्यको भास ॥ ७ ॥
सत्य भासे जब जीवको, सत्य नाम आधार ।
काल भासे तब छूटई, आवे सत्य विचार ॥ ८ ॥
सत विचार परतापते, परखे काल दयाल ।
बिना परख न मुक्ति है, बन्धन सदा विशाल ॥ ९ ॥
जड़ चैतन दो दृश्य हैं, जामे अटके जीव ।
वचन वंश निज गुरु अहै, देइ बताई पीव ॥ १० ॥
मूल लखे जब जगतको, परखे मान गुमान ।
भूल मिटे तब जीवको, पावे सत्य अमान ॥ ११ ॥
सत्य ज्ञानकी चाह जिहिं, धर्मदास तिहिं नाम ।
बोधे सो गुरु देव है, सत्य कवीर अकाम ॥ १२ ॥
बोध पाई गुरु पद गहे, धर्मदास निज रूप ।
इन्द्री ब्यालिस बोधिके, वंश ब्यालिस भूप ॥ १३ ॥
वचन गहे सो वंश है, बिना वचन नहिं वंश ।
वंश अंश सब वचन है, बिना वचन विध्वंश ॥ १४ ॥
प्रकट कही गुरु कवीरने, वचन लखायो आप ।
बिना वचन कस होवई, सत्य असत्यको माप ॥ १५ ॥