सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

शब्दावली

(३९१)

कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरतिमें दीसा ॥३॥ उघरै संपुट
गुरुकी दाया । नरिअरको देखै परभाया ॥ तत्त मूल नरिअरमो
जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्बाना ॥ ४ ॥ अनहद बाजे त्रिकुटी
ताला । तातें भक्ति जो होय रिसाला ॥ बिन करताल पखावज
बाजे । अनहद धुन निसदिन तहैं गजै ॥ ५ ॥ अष्ट दल कमल
फूल जो फूला । तातें सुमिरन किय समतूला ॥ सुन अति जोग
छतीसौ रागा । तातें भांति भांति पद जागा ॥६॥ जो करतमें
देह बिसारै । यहि संसारमें काज सम्हारै ॥ योग समाधि छूटत
नहिं देखा । आरति मेंटै कर्म विशेषा ॥ ७ ॥

उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेंट सु होय ।

गुरुकी दया परगट हो, संपुट उघरै सोय ॥ १० ॥

प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातें सदा आरति गावै ॥
जोग हीन तत्व नहिं लहई । तातें पान बढौना चहई ॥१॥ देखो
मन बहु रंग अपारा । तातें पढ़ुप सेज बिस्तारा ॥ देह समाधि
गंध बहु होई । साधे अग्र प्रबल है सोई ॥ २ ॥ चौका सेत हंस
भल छाजे । सेत सिंघासन छत्र बिराजे ॥ मन औ पवन आहिं
दुइ धारा । तातें पवन अनिल घृत जारा ॥३॥ जोग जुगत बिन
संग न होई । पाले पवन पाहन है सोई ॥ गगन बाव योग अमीरस
चाखा । तातें महाप्रसाद जो भाषा ॥ धन्य अंकूर जीव है सोई ।
परिचय योग करै तन जोई ॥४॥ गरजे जो जायी । दीप शिखर
द्वारै ठहरायी ॥५॥ लावै योग न होय आरती करई । सोई जीव
भवसागर तरई ॥ मूल नाम और सब शाखा । पुढ़प जोग महातम
राखा ॥६॥ जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट दृष्टिमें सुमिरन अनु-
सरई ॥ मूल नाम मुक्ति फल योगा । सो नरिअर मिष्टानक भोगा ॥७॥