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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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प्रस्तावना ।

बड़ा भारी आन्दोलन मच गया, साधारण कवीरपंथी तो ग्रन्थोंको पाकर आनन्द मग्न होने लगे और स्वार्थी जो ग्रन्थोंको सेवक सतियोंको दिखाना भी पाप सम्भ्रान्त थे, बड़े घबराये, मुझपर उनको इतना क्रोध हुआ कि, मुझे पहले तो अदालत तक घसीटा और वहाँ जब कुछ वश नहीं चला तब, पंथी उग्रनाम साहबको सम्झना बुझाकर, मुझे ग्रन्थोंके छपानेसे रोकनेके हेतु, दामाखेड़ा बुलवा लिया, और देखा वे के लिये प्रेस भी लिया गया और प्रथम मेरे देख रेखमें रखा गया । जब मैंने ग्रन्थों के छपानेकी बात चलाई तब बड़े बड़े प्रपंचों द्वारा ग्रन्थ छपायी की बात तो क्या प्रेससेही सम्बन्ध छोड़ना पड़ा। यद्यपि प्रेसमें ग्रन्थ छपानेकेही लोभसे मैंने अपनी गांठके भी बहुत रुपये प्रेसमें लगादिया था तथापि महान अन्त्यायसे सब गबन कर लिया गया । बदलेमें दीवान हंस दास द्वारा मेरी झूठी निन्दा और बदनामी का खूब प्रचार किया गया । दीवान हंस दासकी कारवाई पूर्वके संत महंतोंमें तो चली नहीं, क्योंकि, उन्हें दामाखेड़ेवालोंका सब हाल मालूम था किन्तु, गुजरातके कतिपय, लोगोंने उनकी बातोंको सत्यमानकर द्वेषका बीज अपने अन्तः करणोंमें बोलिया जिसका अंश आजतकभी दृष्टिगोचर होता है ! अस्तु यह भी एक कालकी वाजीही थी नहीं तो साठ वासठ हजारकी लागतका प्रेस पंथी दयानाथ साहब द्वारा, कुछ मूर्खोंके कहनेसे, नौ सौमें एक विधर्मीको क्यों दे दिया जाता ?

अस्तु काल भगवानकी कृपासे ग्रंथ और वाणी वचनके प्रकाशनमें सद विघ्न होता चला आता है और सद्गुरु दयालकी दयासे मैं यथा शक्ति प्रयत्नमें लगाही हूँ । कई वर्षोंके अथक परिश्रमसे, इस वर्ष कवीरपंथी शब्दावलीका यह ग्रन्थ छपने पाया है । कवीरमन्थूरमें भी हाथ लग गया है किन्तु, काल निरंजनकी दृष्टि उसकी ओर भी पड़ी है, अनेक विघ्न आकर उपस्थित हैं देखें क्या परिणाम होता है ?

यद्यपि मेरे पास इस समय चालीस हजारसे भी ऐसी वाणीका संग्रह है जिसमें “कहें कबीर” की छाप लगी है । इच्छा तो ऐसी होती है कि सबही छपकर प्रकाशित हो जाय किन्तु, सद्गुरुने मुझे केवल ग्रन्थ और वाणियोंके संग्रहकी योग्यता दी है जिनके पास साधन है, वह इस ओर ध्यान नहीं देते, मेरे पास साधन नहीं है तबभी बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षा लिये बैठे हैं । यद्यपि इच्छानुसार कार्य्य नहीं होता तथापि लगे रहनेसे कुछ न कुछ तो होताही है । जिन कबीरपंथियोंके पास धन है उन्हें इसका संस्कारही नहीं, नहीं तो उन्हें यदि धनही जमा करना है तो उपस्थित धनकी वृद्धिका, यह ग्रन्थोंका प्रकाशन कितना अच्छा मार्ग है । कुछ ग्रन्थोंको छपाकरही लोगोंने लाखों रुपये कमाये हैं यदि कोई कबीरपंथी इसी