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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 975

बांधसागर

(१०७)

चारिमुक्तिकी कमाई अस्थान

धीरज अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनी संग विहारा ॥
मध्यसरोवर पिंडसिला लै धारी । चौसठकामिनी निरते घरियारी ॥
जो कोई वाम मार्ग को ध्यावै । सो सालोक्य मुक्ति को पावै ॥
पेडी ॥१॥ तहाँते वैकुण्ठ चौवीस कोटी रहाई । तहाँ सुमेर रहचो
ठहराई ॥ तहाँ धर्मराय अविनासी रहही । जो पाप पुण्यका
लेखा लहही ॥ तहाँ रंभा सामीप्य मुक्त है सोई । नवसौ सखी
ताके सँग होई ॥

(पेडी २ वैकुण्ठको विस्तारा)

पांच सीखर सुमेरके रहही । पांचों अंसकाला तहाँ धरही ॥
ईशानकोन ध्रुव आशन कीन्हा । वायु कोन कुबेरको
दीना ॥ नैऋत कोन जमको अस्थाना । अग्नि कोन इन्द्रासन
ठाना ॥ जिनकूं धर्मराय मैं कही । मध्यसिंहासन विष्णुको
सही ॥ सहस्र साठजोजन वैकुण्ठ प्रमाना ॥ ६००००० तेहिके
आगे सुन्य डोर बन्धाना ॥ निर्वाणमारगको जो कोई ध्यावै ॥
सो सामीप्यमुक्ति वैकुण्ठको पावै ॥ पेडी ॥६॥ वैकुण्ठते शून्य
अठारह १८ करोरी ॥ तहाँ लागी सून्यकी डोरी । शून्यमध्य है दीप
अनूपा । आदि निरंजन तहाँ जोतिसरूपा ॥ तहाँ अँधियारी हैं
सुन्य मंझारा । दोय पलंग है सुन्य विस्तारा ॥ तहाँ कोटि
चारि है जोति उजियारी ॥ तहाँ अष्टंगी है शक्ति नारी ॥
सारूप्य मुक्ति सो तब पावै ॥ अघोर मार्गको जो कोई ध्यावै ॥

चौथी मुक्ति आगे अस्थान

ते अक्षर आगे अस्थाना । एक पलंग तहाँते परवाना ॥ तहाँ
अक्षर योग माया विस्तारा । चारि अंश जिनके अधिकारा ॥
तहाँते चार वेद परवाना । चौथी मुक्तिको येथि ठिकाना ॥ तहाँते
आगे कोह ना गएऊ । एहि मता चारों वेद मिलितयेऊ ॥ चारों