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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 973

बोधसागर

( १०६ )

धर्मदास उवाच

धर्मदास तब सौंज मँगाई । सोरह अंश तब दीन्ह चिन्हाई॥
चौका पुरस तब युक्ति बनाई । तनुका तोड़े जल अचनाई ॥
लिख्यो पान समरथ सहिदानी । दीन्हो सन्देश सत्यकी बानी ॥
तीनि अंशकी लगन विचारी । नारीअर अंशको हंस उवारी ॥
नारी पुरुष होय एक संगा । सदगुरु बचन दीन्ह सोहंगा ॥
सोहँग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ॥
पेड़ सोहँग और सब डारा । साखा सोहँ कीन्ह प्रकारा ॥
प्रथम सहज सोहँगकी बानी । दूसरि इच्छा सोह उपतानी ॥
तिसरे मूल सोहँ है भाई । चौथे सोहँ सोहँ निर्माई ॥
सोहँगते भये सोह अतीता । जाको नाम जो कह्यो अचित्ता ॥
अचित्तिते अक्षर सोहँगा । अक्षर सोहँगते कैल सोहँगा ॥
कैल सोहँगते त्रिगुण सोहँगा । सोहँगते सकल सृष्टिको रंगा ॥
अमृत वस्तुते नौ पकारा । सोहँग शब्दके सुमिरन सारा ॥
सो सोहँ अचीन्हि जो पावै । सोहँ डोर गहि लोक सिधावै ॥
जा घट होई सोहँ मतसारा । सोई आवहु लोक हमारा ॥
सुरति सोहँ हृदये महाँ राखो । परचे ज्ञान तुम जगमें भाषो ॥
एती सिद्धि सोहँकी भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ॥
चौका करि दीन्य परमाना । तब जीवहि छूटे अभिमाना ॥
अजावन बीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ॥
ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥
कुल करनी जिन्ह खोय निसाई । काटि फन्द निज घरकू जाई ॥
तन मन धनको मोह न आवै । सो जिव दर्स हमारा पावै ॥
गुरुसों अन्तर कबहुँ न कीजै । साधु सन्त सेवा मन दीजै ॥
एती सनद जीव उजियारा । ताको सुकृत आवै सठिहारा ॥
सोहँ करनी सोहँ विचारा । सोहँ शब्द है जिव उजियारा ॥