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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 957

बोधसागर

(८९)

साधु सन्तको भोजन करावै । पन्द्रह सेर पकवान चढ़ावै ॥
चार पहर सब साज जो करही । सोरह सुतकी पोसी धरही ॥
चार पहर निस बैठक करही । सूर्यस्नेह चौका विसतरही ॥
सुरती सुरत सूर्यपर जोरे । पृथ्वी तत्त्वमें नारियर मोरे ॥
औरहु भाव बहुत हैं भाई । जो समुझे सो बिचलि न जाई ॥
अमी अंकको वीरा पावै । विगड़े हंस लोक को आवै ॥
पान प्रसादे वंश हेतु लेई । पियेपर नाम हमारा लेई ॥
छूटैं हंस कर्मके पारा । चोर उदय घट सूर्य विचारा ॥
चन्द्र हेतु तिन चौका करहीं । चन्द्र लग्नको काल जिझ डरहीं ॥
चौथा चौका चलवेका एहै । सूर्य लग्न निजही मनमें है ॥
देह धरै नहीं कर्म सतावे । सहजे जाय परम पद पावे ॥
चारों चौका एहि विधि करै । सो हंसा तरहै औ तौर ॥
सहजको चौका वासनमें निरतावे । इतने भेद टकसार लखावे ॥
भेद चुरामणिखण्ड अपारा । चुरामनिबस एहि भेद विचारा ॥
उन्हको नाम प्रताप है सोई । इहतो भेद कडिहारको होई ॥
जोन अंकुरी वोहित कडिहारा । सो यह पावे वंस टकसारा ॥
अंस बँसकी परख न पावै । पढ़ि टकसार काल घर जावै ॥
बिन गुरु भेद गहे टकसारा । बिना पुरुषकी नारि बिचारा ॥
बिन दूलहकी कौन बराता । बिना गुरुझूठ जान जिहिं राता ॥
बिना छत्र ज्यों लशकर फिरहीं । बिन गुरु ज्ञान धीरको धरहीं ॥
हमरे पन्थके गुरु धर्मदासा । तिनके वंशगुरु जक्त प्रकाशा ॥
हमरा ज्ञान वंस अस करई । खोवे आपु नरकमें परई ॥
तजै मनै क्रोधे अहँकारा । सो ये गहैं वंश टकसारा ॥
इतने भेद इहै टकसारा । औरै ज्ञान बहुत असरारा ॥
वंश टकसार कडिहारा जो पावै । सो सौ भवसागर जीवमुक्तावै ॥