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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 947

बोधसागर

( ७९ )

चौपाई

यह ना आवे अमर प्रकाशा । जो धन खोजहु धनके पास ॥
यह धन मिले होय बड़ भागी । सोई सन्त पग वैरागी ॥
करै विवेक वस्तु है न्यारी । यह सब है सपनेकी न्यारी ॥
ताहि गहे नर सुरत सम्हारी । सोई सन्त पूरा हितकारी ॥
बारा राशी मन्त्र चौबीसा । यह सब है सपनेको ईसा ॥
विन परचै नर आह जो करई । निश्चय जाय नरक सो परई ॥
जो नहिं मोक्षके शब्द विचारा । तिनहिं काल ले करै अहारा ॥
सारा नाम विन मुक्ति न पावै । बूड़ मरे पुन थाह न आवे ॥
निंदक नरक पौरे नहिं तरई । चार खूंट में भर्मत फिरई ॥
देह धरे नहिं सुतैं दृढ़ाई । उपजत बिनास चौरासी जाई ॥

साखी-भर्म जाल संसार है, सब अरुझे भव भीत ।
कोई कहैं जन एक है, मनमें राखो भीत ॥
चरणाभूत जो पायके, दृढ़ राखे विश्वास ।
निर्भय मुक्ति पाईये, पहुँप दीपकी वास ॥

चौपाई

सुतैं दीपकी अकथ कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥
अकह सुतैं जहैं अगम अपारा । ताहि गहे उतरे भव पारा ॥
लखे अंक जो अकह कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥
तजै पाखण्ड सोई निर्वानी । सोई सन्त कहावे ज्ञानी ॥

साखी-पुरुष सार सों न्यार है, दीखे सबहिन भीत ।
ज्ञानदृष्टि में जगसों छुटे, जो जन प्रेम पुनीत ॥
कहैं कबीर दरसाये, जाके उर निश दिन रहै ।
सोई करे गुरुवाय, झक मारे संसार है ॥