सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 939, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 939

बोधसागर

( ७१ )

गुरु से शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नरकमें जाई ॥
संतन वारे तन मन धामा । सोई संत मरे मम नामा ॥
साखी-होय विवेक शब्दके, जाल मिले परवार ।
नाम गहे सो पहुँच है, मानो कहा हमार ॥

चौपाई

नाम उदित सो संत पियारा । मारों काल होय जर छारा ॥
जिन जिन नाम सुने हैं काना । नर्क न परे होय सुक्ति निदाना ॥
आदिनाम जेहि श्रवणन नाहीं । निश्चयसो जिव जम घर खाहीं ॥
सुमरौ पुरुष काल डर कंपा । भौमाने नाहीं सिर चंपा ॥
नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥

साखी-आदि नाम हैं पारस, मन हैं मैला लोह ।
पारस परस उजियार भये, छूटे बंधन मोह ॥

चौपाई

कहैं लग कहौं कहन नहीं पारा । नाम गहे सो संत हमारा ॥
आदि नाम जस सार के गौसी । लागे बान ठाव रहै वैसी ॥

साखी-सतगुरु मारे बान भर, डोले नहीं शरीर ।
का चाबुक वह कर सके, सुख लागे वह तीर ॥
गौसी लागे सुख भये, मरे न जीवे कोय ।
कहें कबीर अमर सो प्राणी, जो नहीं मृतक होय ॥

चौपाई

लागे जहाँ वस्तु सो पावा । विन लागे को भेद बतावा ॥
नाम अमर रस चाखें कोई । ताको जरा मरन नहीं होई ॥
अक्षर गुप्त सोई मैं भाषा । और शब्द स्वाल अभिलाषा ॥
साठ सुन्नके सुने जो भेऊ । यह गति जाने बिरला केऊ ॥
पाताल सुन्न है बारह खंडा । बारह सुन्न कहौं ब्रह्मंडा ॥