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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 934

( ६६ )

मुक्तिबोध

सद्गुरुवचन

कहैं कबीर धर्मदास सुजानी । अकह हतो ताही कहो बखानी॥
जब नहिं लोक दीप विस्तारा । तब नहिं सुकृति करी संसारा॥
तब नहिं धरती अमर सुमेरु । तब नहिं हतो अमल औकुबेरु॥
तब नहिं सृष्टि सकल पसारा । आप अकह तब हता निनारा ॥
सकल सृष्टि उत्पन कछु नाहीं । तब सब उत्पन कहा सब नाहीं॥
हते आप तब शब्दहिं स्वाला । इच्छा भये कीन्हे उजियाला ॥
इच्छा ते अनहद ध्वनि बानी । सुरत संभार सृष्टि उत्पानी ॥
सुरत भीर तेहि माहिं समानी । इच्छा तैं अनुभव उत्पानी ॥
तब ते अक्षर भेद निनारा । साखी पद कीन्हा निरवारा ॥
अकह अचल पुरुषहिं तहां आपू । नहिं दुख सुख नहीं सन्तापू ॥
सबका मूल ताहिं सों लागी । उलट समय सोई बड़ भागी ॥
साखी-कहैं कबीर जो शब्द लखि, रहैं सुतैं लौलीन ।
कबीरा सुतैंके समय, निश्चय लोकको चीन ॥
जाके चित अनुराग है, ज्ञान मिले नर सोय ।
बिन अनुराग न पावई, कोट करे जो कोय ॥

चौपाई

सत्य शब्द जो आवे हाथा । सकलो काल नवावे माथा ॥
साखी-काल खड़ा सिर ऊपरे, काल नजर नहिं आय ।
कहैं कबीर बल आपने, जम से जीव छुड़ाय ॥

चौपाई

नाम अमर मल्यागिर भाई । पीवत विष अमृत हो जाई ॥
निशि दिन रहे मल्यागिर संगा । विश न लगे सो तिनके अंगा ॥
साखी-काल फिरे शिर ऊपरे, हाथों धरे कमान ।
कहे कबीर गहु नामको, छोड़ सकल अमान ॥