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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 932

( ६४ )

मुक्तिबोध

आदिनाम कहैं खोजहु प्राणी । जाते होय मुक्ति सहिदानी ॥
मूलमन्त्र मन्त्रन महि साचा । जोगहि जलेसोनगरहि पहुँचा ॥
आदि नाम जेहि खाजत भेटा । जरा मरन को संशय भेटा ॥
आदि नाम निःअक्षर साँचा । जाते जीव काल सों बाचा ॥
निःअक्षर धुन जहवाँ होई । ताहि जपे नर बिरला कोई ॥
जाके बल आवे संसारा । ताहि जपे नर हो भव पारा ॥
गुप्त नाम गुरु बिन नहि पावे । पूरा गुरु हो सोइ लखावे ॥
सार मन्त्र लखे जो कोई । विषधर मंडवा निर्मल होई ॥
आदि नाम मुक्तामणि साँचा । जो सुमरे जिव सबसाँ बाचा ॥
आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥
जब लग गुप्त जाप नहि जाने । तबलग काल हटा नहि माने ॥
गुप्त जाप ध्वनि जहँवाँ होई । जो जन जाने बिरला कोई ॥
गुप्त मता लै पुरुषहि चीन्हा । जबते गुरु मोहिं दिशा दीन्हा ॥
तात वरण प्रभु वरण विहीना । सकल मनुष्यनगर नहि चीना ॥
मूल मन्त्र जेहि पुरुषके पास । सोई जनको खोज ले दासा ॥
मूल मन्त्र है ओ सब साखा । कहैं कबीर मैं निजके भाखा ॥
लिखो न जाय कहै को पारा । हैं अक्षर में जो पावै निरबारा ॥
लिखो न जाय लिखामें नाहीं । गुरु बिन भेट न होवे ताहीं ॥

साखी-प्रीति विना नहि पाइये, जो नहि सुतं समान ।
पुरुष दीप तब पावइ, जबहीं तजै अभिमान ॥

चौपाई

परम पुरुषसों भेट न भयऊ । विन गुरु दयाप्रगटना कहेऊ ॥
धर्मदास मैं कहां समुझाई । निर्गुण भेद कोइ बिरले पाई ॥
तुम तो जीव पर बोधो जाई । जमराजा परपंच लगाई ॥