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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 93

ज्ञानसागर

( ८३ )

चौपाई

भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥
पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥
हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥
पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥
औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥
निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥
कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥

साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥
जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥
जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥

कबीर वचन

साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥
पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥
अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥
चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥
अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥
इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥
नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥
निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥