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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 924

( ५६ )

भवतारणबोध

कोई कहै हम पढ़े पुराना । तत्व अतत्त्व सबै कछु जाना ॥
कोई कहै विद्या आधीना । सब विचार कायामें चीन्हा ॥
कोई कहै तप वश करि राखा । तप है मूल और सब शाखा ॥
कोई कहै कर्म अधिकारा । कर्महि सो उतरे भवपारा ॥
कोई कहे भाग्य लिखा सो होई । भाग्य लिखा मेटै नहिं कोई ॥
कहै लग कहौं यही सब कहई । भेद हमार न कोई लहई ॥
सब सों हार मान मैं बैठा । ये सब जीव काल घर पैठा ॥

सारखी-सोइ काल करतार सोइ, भक्ति सुक्ति तेहि हाथ ।
मेरो कह्यो नहिं आदरे, परंपंची बड़ साथ ॥
मनहिं प्रपंची मनहिं निरञ्जन, मन ही है ओंकार ।
फन्दा है त्रयि लोक का, कोइ न भवते न्यार ॥
निरंजनहिं निर्वाण पद, कही तुम्हीं हितवन्त ।
योग यती संन्यास गत, कोइ न पावत अन्त ॥
सप्त सुर्त में रमि रहा, सुर्त शब्द तेहि हाथ ।
ऐसी अगम अपार गति, तीन लोकके नाथ ॥

चौपाई

सात शून्यका सकल पसारा । सात शून्यते कोइ न न्यारा ॥
सात सुर्तका भेद बताऊं । तामें ज्ञान सकल समुझाऊं ॥
उत्पत्ति प्रलय है वाके माहीं । इन गति सों कोइ न्यारा नाहीं ॥
प्रथमहिं अमी सुर्त निज ठौरा । तहाँ निरंजन कीन्हा दौरा ॥
वहाँ जाय अमी ले आवै । ताहाँ अजर बीज उपजावै ॥
सोइ बीज रक्त में धरहीं । यह विधि सों वह उत्पत्ति करहीं ॥
बीजहि जलका रंग कहाया । तासों रची सकलकी काया ॥
दूजी मूल सुर्त तेहि संग । घट २ माहि बनावे रंगा ॥
तीजी चमक सुर्त अंबारा । नौ नारीमें किया पसारा ॥