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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 911

बोधसागर

( ४३ )

जन्म लेय उज्ज्वल तन पावे । सम्पति है जगमें पुनि आवे ॥
ऊंचे घरसे ले अवतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यवहारा ॥
इन्द्री साधन है यह नीका । विना भक्ति जानों सब फीका ॥
इन्द्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥
क्रोध किये गति सुक्ति न पावे । भक्ति महात्महाथ नहिं आवे ॥
बरत एक भक्तिका पूरा । और बरत कीजै सब दूरा ॥
और बरत सब यम की फांसी । भक्ति बरत मिलही अविनासी ॥
हर अवराधन की सुनु बाता । कहा भेद सुनिये तुम ज्ञाता ॥
हरि हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर होत भव फेरा ॥
बहुत प्रीतिसों शिवको ध्यावे । रिधि सिद्धि द्रव्य बहुत सुख पावे ॥
मन जिसके निश्चय कर धरहीं । गिरि कैलासमें वासा करहीं ॥
फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं ॥
ताते संशय छूटे नाहीं । भवसागरमें जीव जो जाहीं ॥
शिवकी साधन है यह गती । निर्भय पद पावे नहिं रती ॥
जाके सुमिरे योगी यती । चौरासी भरमें उत्पती ॥
हरि हरकी यह कथा सुनाई । आगे और सुनाऊ भाई ॥

सारखी-शिवसाधनकी यह गती, शिव हैं भवके रूप ।

विन समझे ये जगत सब, परे महा भ्रम रूप ॥

नरक वासमें मनु परे, ऐसी शिवकी मौज ।

कहे कबीर विचारिके, मिटे न यमकी फौज ॥

चौपाई

हरि हरि नाम विष्णुका होई । विष्णु विष्णु भाषे सब कोई ॥
विष्णुहिं को कर्ता बतलावे । कहो जीव कैसे फल पावे ॥
सब घट माहीं विष्णु विराजे । खान पानमें विष्णुहि गाजे ॥
सकल भोग विष्णु जो लेही । भोग करे जग भरमें देही ॥