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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 908

( ४० )

ज्ञानबोध

सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥
आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥
तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥
सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥
सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥
जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥
जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥
लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥
तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥
सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥
धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥

सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।

कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥

धर्मदास-वचन चौपाई

कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥
अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥
आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥
आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥
अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥
अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥
सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥
सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥
अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥

सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।

अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥