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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 897

बोधसागर

( २९ )

तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥
सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥
यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥
जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥
हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥
ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥
तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥
और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥
धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥
कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥
तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥
जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥
देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥
नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥
हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥
नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥
गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥
चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥
नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥
जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥
चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥
सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥
द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥
जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥