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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 891

बोधसागर

( २३ )

चौपाई

ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥
सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥
ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥
कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥
ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥
नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥
सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥
धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥
ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥
सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥
ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥
भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥
पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥
तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥
भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥
जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥
काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥
ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥
यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥
यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥
जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥