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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 889

बोधसागर

( २१ )

उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥
नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥
सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥
आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥
आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥
आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥
आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥
यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥
साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥
कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥
भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥
राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥
राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥
ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥
मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥
पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥
मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥
पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥
टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥