कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १०३ )
रिजकमें बाहँम किसीको लाशरीकँ ॥
देख आते मत किसीको सहँम जा ।
उसकी किंसमतका है साथ उसके धरा ॥
कहके यह और हँट वहाँसे जा रहे ।
सामने तकियाँके जा सुस्ता रहे ॥
शामको एक लोटा और दो रोटियाँ ।
तकियाँवालेको वहाँ पर उतरियाँ ॥
और उनके वास्ते खँवाने तआम ।
यक पुलाओंकी रिकाबी एक जाम ॥
जर्फ चीनी और उनपर ख्वाँन पोश ।
यक तकल्लुँफसे उनमें नाय नोश ॥
खाके इब्राहीमने पानी पिया ।
शुक्नेने आमतकाफिरकसिजदा किया ॥
यह तो ने अमत लेकबस चलते रहे ।
वह जो तकियादार थे जलते रहे ॥
शाम जब आयी वही फिर उतरियाँ ।
साथ यक लोटाके वा दो रोटिया ॥
मारे गुस्साके उन्होंने यों कहा ।
मैं नहीं खानेका खाना आपका ॥
एकको तुम भजो कुलियाँ और पुलाँओं ।
मुझको जौकी रोटियाँ रुखी खिलाओ ॥
जैसा वह दुवैश मैं दुवैश हूँ ।
जैसा वह दिलरेश मैं दिलरेश हूँ ॥
क्यों बढ़ायी एककी यह इज्वैशाँ ।
है फकीर आपसमें सब एकसा ॥