कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १०१ )
- वार्ता २ ।
बादशाहत छोड़कर अद्दम चले ।
कोई व सिंहराँकी तरफको शहरस ॥
बेटेको अपने किया कायमंमुकाम ।
बादशाहत वह लगा करने तमाम ॥
आपली फिर राह सिंहरा की गरज ।
कुछ न रखी माल दुनियाकी गरज ॥
साथ एक प्याला लिया और बोरियाँ ।
एकमिसवाँक और एक सकिया लिया ॥
एक सोजन खलका सीनेके लिये ।
साथ यह असबाब जरूरी ले लिये ॥
शहरसे बाहर निकल जो की नजर ।
सोते देखा एकको वा खाकपर ॥
बोरिया फँका वहाँ औ यह कहा ।
खाकसारोंको जमीन है बोरिया ॥
आगे जा देखा तो एक बेचारः आँष ।
औकस पीता है बैठे वे हिजाब ॥
हाथसे प्यालेको भी फोडा वहीं ।
यानी पी लेवेंगे हम पानी योहीं ॥
आगे देखा एक सोता है गरीब ।
हाथको रखे सिन्हाने बेनसीब ॥
तकिया भी छोडा फजूली जानकर ।
यानी एक यह भी है मुझपर बौरसर ॥
- इस वार्तामें जिन २ शब्दोंपर अंक दिये गये हैं उनका अर्थ वार्ताके अन्तकी टिप्पणी में देखो ।