सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

( ७४ )

ज्ञानसागर

भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥
वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥
सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥
ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥
आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥

साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥
अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥

चौपाई

तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥
मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥
रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥
कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥
प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥

नूरी वचन

हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥
सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥
रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥
बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥
साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥
श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥

चौपाई

जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥
चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥
सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥