सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 839, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 839

बोधसागर

( ११ )

बीतने पर उनके नानाका जिन्होंने अपना राज्य इन्हें देकर आप भजनके लिये एकान्त वास किया था देहान्त हो गया ।

नानाके मर जाने पर इब्राहीम शाहके मन पर बड़ा धक्का लगा उनका चित्त संसारसे एकदम वैराग्यको प्राप्त हुआ अब उन्हें दिन रात परलोक की चिन्ता रहने लगी ।

याने इब्राहीमशाहे दो जहाँ ॥
करता था जाहिरमें गो कारे शहाँ ॥
लैक था दुनियासे दिलबरदाशता ॥
बेवफा व बेबका पिन्दाशता ॥
कारदुनियाँस नथी चसपीदगी ॥
कुछ तहेदिलसे नथी गरवीदगी ॥
जानता था कार दुनियाँ सुस्तआर ॥
करता था बहरे जरूरत कारो बार ॥
मुल्करानी उसनेकी वबा आब ताब ॥
दसबरस वरलाह आलम बिलसवाब ॥
अदल अपने असिरमें ऐसा किया ॥
महो सुतलक होगया जौरो जफा ॥
शाम आपरवानेको देत कलीफ अगर ॥
किताजल्द उसका करे गुलगीर सर ॥
जुलमसे तोडे जो बुज ठत्री हरी ॥
फेर दे कस्साब गरदन पर छुरी ॥

इसके आगे नानाकी मृत्यु देखकर इब्राहीमशाहके हृदयमें विरागका अंकुर विशेष वृद्धिको प्राप्त हुआ और सदगुरुने जिस प्रकार उन्हें उपदेश देकर सत्य पदको प्राप्त कराया उसका