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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 830

(१०)

मुलतानबोध

जुज्वको है गचै जायद इजतरार ।
कलको भी बेजुज्वके कबहो करार ॥
गो नहीं जाहिरका पैगामों सलाम ।
जुज्व कलमें है मगर पिनहाँ कलाम ॥
दिलको हरेकके खलिश है जो यहाँ ।
है अनासिरकी कशिशयह ऐ जवाँ ॥
जज्व अपने जुज्वको करते हैं कल ।
उस कशिशका है बदनमें शोरोगुल ॥
हरबशरको है जो दिलमें इजतराब ।
खींचती है उसको पिनहानीतनाब ॥
रिश्तए उलफसे रहता है बंधा ।
जुज्व अपने कुलके साथऐबाखुदा ॥
जुज्व तनको है जो कुलके साथरन्त ।
है कशिशसे उसकी तेरी अकलखब्बत ॥
अपनी गुलफतसे तुझे है यह गुमाँ ।
मुझको जोफे कलब और मादा है अयाँ ॥

बादशाह दिल भरके इब्राहीमको प्यार कर लेने पर जैसे
ही गौर से उसकी ओर देखने लगा वैसे ही उसे अपनी लडकी
की याद आयी । लडकी की याद आतेही उसकी सुरत बाद-
शाह के सामने आ खड़ी हुई । अब बादशाह देखता है तो इब्रा-
हीमकी और उसकी लडकी की शकल में बाल बराबर भी भेद
नहीं है । कहते हैं कि, उस समय बादशाह इतना रोया कि,
उसका चेहरा लाल हो गया और आगे के कपडे आँसू से भीग
गये । फिर जब मन कुछ ठहरा तब बादशाहने मुल्लाजीसे पूछा
कि,—यह लडका कहाँ रहता है ? इसका बाप कौन है ? यह