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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 802

( ६२ )

मुलतानबोध

जो जिव माने शब्द हमारा । सो जिव उतरे भौजल पारा ॥
तबही शाह भये आधीना । शिर लेह चरण कमल में दीना ॥
चरण परवारि चरणाभृत लीन्हा । प्रेम भाव सतगुरु कहँ चीन्हा ॥

मुलतान वचन

अब कीजे मम साहिब काजा । जाते नहिं छेडे यम राजा ॥
सोई नाम सुहि देहु बतायी । जाते जीव अमर घर पायी ॥

कबीर वचन

कहें कवीर मुक्ति तब पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥
उन्मुखनि ध्यान रहो लौ लाई । अजपा जपो सदा दिल भाई ॥
निशि दिन मनुवा अस्थिर राखो । नाम अमीरस रसना चाखो ॥
नाम प्रताप मुक्ति जिव पावे । जनम मरणको दुःख मिटावे ॥
गहौ नाम सत्य लोक सिधावो । तहाँ जाय बहुते सुख पावो ॥
वहि घर हँसा करई आनन्दा । काटे कर्म कालको फन्दा ॥
बहुविधि शोभा रूप अनूपा । षोडश रवि सो हँसको रूपा ॥
किया चहो तुम अपनो काजो ❁ । यम तृण तोरि आरती साजो ॥
सहज चौका करि दीनो पाना । यमका बन्धन हृदय उठाना ॥
अमर अंक जो परवाना पावे । काल कला तजि लोक सिधावे ॥
प्रथम पान परवाना लेई । पीछे सार शब्द तेहि देई ॥
तब सतगुरुने अलख लखाया । करि परतीत परम पद पाया ॥
ऐसी रहनी गहे जो कोई । सत गुरु पद पावे नर सोई ॥
तन मन धनका मोह बिसारे । सो हँसा सत्य लोक सिधारे ॥
सोरठा-शाह किये तन खाक, अपने पिव के कारने ॥
खाक मिली भये पाक, आदमते भये औलिया ॥

• इस आधो चौपाई तक तो पुरानी प्रतिके अनुसार है । इसके प्रथम जो गडबड है वह वहीं टिप्पणियों द्वारा दिखलायी चुका है । अब यहोसे जो गडबड है तो नवीन प्रति की संक्ति पूरी हो जानेपर ऐसी फूटके बिगड़के साथ उसे भी देईगा ।