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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ६० )

मुक्ताननबोध

सोरठा-तब साहब कछु दीन, रूखा सूखा टूकडा ॥
शीस नायके लीन, खरी कसौटी नामकी ॥

चौपाई

कछु भायो कछु औरहि दीना । मनमें नाहि गुनावन कीना ॥
जो मुख पांचो अमृत पावत । सो मुख सूखा टुकडा खावत ॥
आसन वासन अभूषण नाना । सो सब तजे भूरि मनमाना ॥
जेहि लागीं तिन ऐसी कीन्हा । कहे कबीर प्रेम मन चीन्हा ॥
प्रेम गली अति सांकरि भाई । राई दशावां भाग रहाई ॥
मनअहिरावत किस विधि जावे । विरले सत कोइ मारग पावे ॥
साखी-प्रेम बन्ध अति दुर्लभ, सब कोइ सके न जाय ॥
चढना मोम तुरंग पर, चलना पावक माय ॥
छन्द-मिही सुई को नाको जिमि तिमि इशक मारग ठानिया ॥
ताही ते कोउ झीनि होइ के प्रेम अगम गम जानिया ॥
जिन करि फना मरो आपको सो लहैं सुखको धामहो ॥
कहैं कबीर आप जहाँ तहाँ नहिं मिलत अराम हो ॥
सोरठा-मन महाँ शाह उदास, कबहुँक दरश मैं पाइहौ ॥
पुरवहिं मोरी आस, प्रगट रूप जब देखिहौ ॥
जबहि शाह घट विरह समायी । दोय कर जोरिके बिन्ती लायी ॥
दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन मोको दीजे ॥
शंख्द स्वरूप रहिरूप छिपाओ । प्रकटरूप मुहिदरश दिखाओ ॥
जब हम लगन शाह घट चीन्हा । तब हम रूप प्रकट तहैं कीन्हा ॥

१ पुरानी प्रतियोंमें यह चौपाई इस प्रकार है :

नारि रूप तुम लेउ छिपाई । पुरब रूप धरि बरसा दिखाई ॥

और इसका सम्बन्ध उस कथासे है जहाँ सहैनी बादशाहके सेजपर सोगयी है और उसे मार पडा है ।

पर जब सबीने बादशाहको समझाया है तब बादशाह अपने मनमें विचारने लगा है कि ।