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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ५१ )

मन में शाह तब ऐसा जाना । यह दुर्वैश है खुदा समाना ॥
बार बार मोहि आनि चितार्ह । सोह दुर्वैश आप है साँई ॥
तब अपने दिल कीन्ह विचारा । इनसे कारज होय हमारा ॥
जो यह कहे सोई चित दीजे । इनका वचन मान शिर लीजे ॥
इतना शाह मन करत अन्देशा । नहीं वहाँ कुत्ता नहीं दुर्वैशा ॥
तबहि शाह मन कीन विचारा । निश्चय है यह सिर्जन हारा ॥
सार्वी-कहे शाह अबकी मिले, पुरवे मनकी आस ॥
कदमें शिरे छुआवहुँ, पलक न छाडूँ पास ॥

चौपाई

बन ते शाह नगर में जाई । मन जिन्दा में रहा समाई ॥

जिन्दा वचन

गुप्त रूप तब शब्द उचारा । इब्राहिम सुनु वचन हमारा ॥
नाहक जिव तुम मारि उडाई । तैसा हाल तुम्हारा भाई ॥
जाहि समय इजराइल ऐहैं । महा भयंकर रूप दिखाहैं ॥
हनिहैं सुगदर धरिहैं चोटी । उठै अगिन तब बोटी बोटी ॥
ताहि समय पुनि करिहो रोरा । काम न आवे सेन करोरा ॥
मारत पंछी दरद न आई । एक दिन ऐसा तुम पर भाई ॥
बैन सुनत सुरछित मन माहीं । गुप्त भये पछताने ताहीं ॥
कहे शाह खोजो तेहि जायी । जिन ऐसी सुहि बात सुनायी ॥
खोजि थके पुनि सुहि नहीं पाये । सुरछित शाह भवन चलि आये ॥
तबहि शाह मन ज्ञान समाना । जिन्दा वचन साँच कर माना ॥
राज पाट सुख सम्पति देहा । यह सब दीखत स्वप्न सनेहा ॥
ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आही । छोडेउ तरस्त तबे बादशाही ॥

१ मुसलमानों धर्मके विस्वासके अनुसार इजराइल एक फिरीस्ता है जो सब प्राणियोंके आत्माको शरीरसे अलग करता है तब मृत्यु होती है ।