कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४८ )
सुलतानबोध
तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना ॥
तबै शिकारी दुहुँ दिशि धावैं । पावैं न शिकार मनहि पछतावैं ॥
यहि विचलीला अस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित लगाई ॥
हरिन एक जो कनक रंग देखा । हीरा रतन मणि जडे विशेषा ॥
देखि सरूप शाह ललचाई । यहि मिरगा कहैं घेरो भाई ॥
आज्ञा पाइ चले असवारा । घरयो हिरण सेन मझारा ॥
कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेहौं भाई ॥
सेना सब से तब कहे पुकारी । मिरगा भागि शाह तर गयऊ ॥
शाह सब से तब कहे पुकारी । मिरगा मारि लाऊँ यहि बारी ॥
मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नहिं कोइ चेला ॥
छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥
लागी प्यास शाह को भांरी । महा भयानक बनही मझारी ॥
वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशेषा ॥
मिला फकीर एक तहैं वासा । कुत्ता दोग्य रहै उन पास ॥
शीतल कलशा पानिहि भरिया । जापर ठिलिया मठका धरिया ॥
खोजत नीर शाह चलि आये । दुआ सलाम करि वचन सुनाये ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान प्यास सुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ॥
दुर्वेश वचन
हम फकीर दुर्वेश कहावैं । सुरति होय तो भरो पियावैं ॥
पियो शाह जल लियो निवासा । जिन्दे कीना अजब तमाशा ॥
१ दूर से आहू उते आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मारकर ॥
होके वह अपने सवारों से जुड़ा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ॥
जाते जाते हो गया आहू खड़ा । वाफ़िहतत आबिन अब्रम से कहा ॥
तुम्हको इस खातिर नहीं पंदा किया । वहसियों पर ता करे जोरोजका ॥
है गरज ईजाद से तेरे कुछ और । कर जरा तू विलम अपने आप गौर ॥
बात यह कहकर वह गायब होगया । नक्शा उसका शाह के विलपर हुआ ॥