कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 778, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३८ )
मुलतानबोध
पण्डित साधु संन्यासी आये । जोगी जंगम यती बुलाये ॥
ज्ञानी ध्यानी सबके पीरा । काजी मुल्ला सेख फकीरा ॥
सब मिलि भेष जुड़े तहँ आयी । तिनसों वचन बूझा अर्थायी ॥
तबहि शाह सब टेर सुनायी । अल्लह रूप मुहि देहु दिखाई ॥
खुदा मिले कह कौन उपाई । कौन राम अरु कौन खुदाई ॥
एक खुदा यक और को होई । काहे भयो एक अस दोई ॥
दोऊ दीन मिलि कहो ससुझायी । दोमैं साँच कौन ठहराई ॥
दोउ कर जोड़ि सबन सो कहेऊ । बहुत अधीन आप तहँ भयऊ ॥
होय अधीन तब शीस नवायी । सबसे बूझे मन चित लायी ॥
सब मिलि कहाँ खुदाई सन्देशा । मेरे मनका मेटो अँदेशा ॥
साहब बसे कौन से देशा । सो मुहि बात कहो डुरवेशा ॥
दोऊ राह यह किनहि चलायी । किन वैकुण्ठ विहिस्त बनायी ॥
एती सब मिलि कहो दिवाना । नातो दूर करो कुफराना ॥
बिन देखे सबही दिल धरहीं । कान छिदाय अरु खतना करहीं ॥
हमरे दिलका मेटो अँदेशा । हम माने तुमरो उपदेशा ॥
हिन्दू सवे वैकुण्ठहि धावैं । सुसलमान विहस्त ठहरावैं ॥
इनमें कहाँ खुदा का बासा । बिन देखे कीनो विश्वासा ॥
किनहु खुदाका घर नहि पाया । झूठ झूठ सब ढ़ंद मचाया ॥
खुदाकी खबर न कोइ बताहीं । सबको जडो कोठरी माहीं ॥
दोऊ दीन यह किन भरमाया । खुदाकी खबर किनहु नहि पाया ॥
सारखी-दोऊ दीन समझावहू, मो मन बहुत अन्देश ॥
कौन खुदा दो दीन रचे, बसे कौन सो देश ॥
कोपे इब्राहीम तब, ये सब भरम भुलाहिं ॥
खुदा भेद कोउ ना कहे, डारो कोठरि माहिं ॥