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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 766

सत्यकबीराय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

व्यासस्तरंगः

श्री ग्रन्थ काफिर बोध

मंगलाचरण-सोरठा

बन्दौ श्री सत्य कबीर, कुफर नशावन जगत गुरु ॥

पावों सत मति धरि, दूटे कुफर जंगल सब ॥

ग्रान्धारम्भः

कौन सो काफिर कौन मुदारि । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुस्सा काफिर मंनी मुदारि । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ बैठे सरवरके तीर ॥
चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ॥
नंगे पायन पृथ्वी फिरे । हाट न लूटे बाट न पैं ॥
हमतो(बाबा)किसीका कछुन बिगारै । दर्द मन्ददिल दया सबारै ॥
दुनिया लोक सो उलटी करै । सत्यनाम सदा उच्चरै ॥
सिक्का देखि न कहिये फकीर । फकीर न कूटे पुरानी लकीर ॥
काफिर सो कुफराना करै । अलह खुदाय सो नाहीं डरै ॥
करै न बन्दगी फिरे दिवाना । गरभ बांधि फिरे गैवाना ॥
बोल कुबोल सेवै विसरावै । खून खराफातको दूरि बहावै ॥
दिल में चोर कमर में कत्ती । लोगन के घर भाजे रत्ती ॥
अलह के नामे बाँटे खाना । सो कहिये सांचे मुसलमाना ॥
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खडी ना छेडे पडी न खाय । सो मुसलमान विहिश्तको जाय ॥

१ कोष । २ अभिमान । ३ व्यभिचार । ४ जारी ।