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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 733

बांधवसागर

( १५१ )

कारीगर

राजा कहा हमारा कीजै । सोलह दिनकी अवधी दीजै ॥
हमको साज मूरति का देओ । देवलको द्वार मूँदि कर लेओ ॥
जबही साज देवल ले जाऊ । तबहीं द्वार मूँदि हो भाऊ ॥
तबही कह्यो मूँदि पौरिहि दीजै । सब कोइ गमन यहाँसे कीजै ॥
सोलह दिनमें द्वार खुलै हो । तौ कछु विघ्न नहीं तुम पैहो ॥
देह कपाट तब ताला दीना । चहुँ दिशि पण्डों चौकी कीना ॥
दिन दंश सो बीति जब गयऊ । चलत फिरत गोरख तब अयऊ ॥

गोरख वचन

गोरख कहे दर्शन मोहि दीजै । नहिं तो शाप हमारो लीजै ॥

सत्यकबीर वचन

तब पण्डा राजा पहुँ जायी । राजा से सब बात सुनायी ॥
राजा पण्डा सों कहे बुझाई । कौन शाप गोरखकेर उठाई ॥
तब पंडा गोरख पै आये । हाथ जोरिके विन्ती लाये ॥
दिनछः हम तुमसों माँगे भाई । ता पाछे हम दरश कराई ॥

गोरख वचन

साखी-मैं गोरख प्रसिद्ध हूँ, हमरे आड जनि होइ ।
मोको दरश करावहू, कै शाप हमरो लेहु ॥

चौपाई

तब राजा गोरख पगु पड़िया । बहु विन्ती भावसों उच्चरिया ॥
जब गोरख नहिं माने राई । तब राजा अस कह्यो बुझायी ॥

१ इस चौपाईमें दशदिनके पश्चात् गोरखका आना बतलाया है किन्तु नवीन प्रतियों में सात ही दिन लिखा है ।

“विना सात बीते पुनि जाई । फिरत फिर गोरख पुनि आई ॥”

नवीन प्रतियोंमें सब ऐसे ही बेतुकी वाणीका ऐसा गढ़बड हुआ है कि सब यहाँ पर लिखना असम्भव है ।