कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 725, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(१४५)
सत्यकबीर वचन
बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथ अरपाओ ॥
तब हम न्योते तुमरे आवें । जब तुम सेवो पुरुषके पावें ॥
मुनत लक्ष्मी ठाकुरपहँ आयी । जो कुछ सुनीसुकहि समझायी ॥
लक्ष्मी वचन
भक्त कबीर नाम जो आहीं । सो तो बैठे समुद्र की ठाहीं ॥
जब उन डांट समुद्र बताया । तबहीं समुद्र पाताल समाया ॥
तब हम न्योत कबीरहि दीना । तब कबीर हमसों छल कीना ॥
करमी सभा बनाय सो लीन्हा । तब हम ध्यान पुरुषका कीन्हा ॥
मिटिगयी सभा कबीरयकरहेऊ । तब कबीर ऐसे पुनि कहेऊ ॥
जिन साहबने तुमको कीन्हा । काहे विसार तुम उनको दीन्हा ॥
तुम तो गर्व झुलाने सोई । ताते काय्य साधन नहिं होई ॥
छप्पन अटका जगन्नाथ लगाये । सत समरथ को धरे विसराये ॥
कहा कहै प्रसाद तुम्हारा । हमको समरथ देवन हारा ॥
हम बिन्ती सतगुरु सों कीन्हा । तब सतगुरु सिखावन दीन्हा ॥
बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथकोअरपाओ ॥
तब हम न्योते तुम्हरे आवें । हम तो अंश पुरुष के भावें ॥
उनकी गति मति लखी न जाई । तुम त्रिगुण होय सृष्टि बनायी ॥
हम सतगुरु होय जिव मुक्तावें । हम ती सबें पुरुष के पावें ॥
तुम त्रिगुण का राज कराई । तब बोले गांविन्दे राई ॥
श्रीकृष्ण वचन
ज्योति अंश से हम उत्पानी । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जानी ॥
लक्ष्मी वचन
तब लक्ष्मी कहै समुझायी । वह तो ज्योति हमारी आई ॥
तुमको तो हम उत्पन कीन्हा । चारिस्वरूप हमहिं रचिदीन्हा ॥
त्रिगुणस्वरूप जो सृष्टि बनायी । चौथे अंश ज्योति थपायी ॥