कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबाघसागर
( १२९ )
तिनुका तोरि करो जिव कोरा । छूटै काल मिटै झकझोरा ॥
चौका आरति करि विस्तारा । हनुमान तुम लेहु निरधारा ॥
समरथ हुकुम भक्ति यह ठानी । जाते यम नहीं बांधै तानी ॥
बनि आवै तो करिये भाई । नातो लीजो पान बनाई ॥
साखी—यहि समरथ की भक्ति है, सुनो ज्ञानकी रीति ।
योग मुक्ति निज भाषेऊँ करौ सो निजके प्रीति ॥
चौपाई
अब तुम ज्ञान सुनो हनुमाना । समरथ को है निर्मल ज्ञाना ॥
निराधार आधार न कोई । पहुँचे साधु श्रृंमां सोई ॥
निर्गुण सगुन ध्यान करिपावे । तहाँ सगुन निरंजन नहीं आवे ॥
अनुभव वाणी करे परकाशा । सो साधू मोर स्वॉस उस्वॉसा ॥
महाकठिन खाँडे की धारा । ऐसा निर्गुण ज्ञान हमारा ॥
निर्गुण सर्गुण दोनों नाही । है सो हंस नामकी छाहीं ॥
तीनों गुणते सगुण सो होई । चौथा गुण निर्गुण है सोई ॥
निर्गुण सगुण दोष के पारा । शब्द अरु स्वास नहीं ओँकारा ॥
अदम्य ज्ञान विकट है भाई । विकट राह कोइ बिरले पाई ॥
ज्ञान गहे बिनु मुक्ति न होई । कोटिक लिखै पढ़े जो कोई ॥
१ इस चौपाईके तीन पाठ सब ग्रन्थोंमें अलग २ मिलते हैं । एक तो यही है । दूसरा पाठ यह है—
“निर्गुण ज्ञान ध्यान धरि आवे । तहूँ कोइ सगुण नजर नहीं आवे ॥”
तीसरा पाठ यह है—
“निर्गुण ध्यान धरे जो पावे । निर्गुण सगुण नजर ना आवे ॥”
इसी प्रकारसे अनेक प्रतिधर्मोंमें अनेक मतभेद हैं कहीं तक कहा जाय । परचातके लेखक महाशयोंकी
कृपासे न भावूस कबीरपन्थी साहित्यमें क्या २ फेर हुआ है और होता जाता है ।
नं. ५ कबीरसागर - ६