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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 694

( ११४ )

हनुमानबोध

हनुमत कहिये महा अभिमाना । कैसे लीन साहब सो पाना ॥
कैसे हनुमत सेवा ठानी । कैसे उन बचने सो मानी ॥
यह वृत्तांत कहो तुम ज्ञानी । रामचन्द्र के हनुमत मानी ॥
कैसे तिन हिरदय नाम समाई । सब दया करि तुम कहहु सो साई ॥

कबीर बचन

कहै कबीर सुनु धर्मनि आयी । त्रेता युग महीं हनुमत चित्ताई ॥
सेतुबन्ध रामेश्वर हम गयऊ । तहवाँ पड़ँच हम सुनीन्द्र कहयऊ ॥

साखी-सेतु बन्द में जायके, देखा हनुमत वीर ।

बहुत कला है तासुकी, सबही बजर शरीर ॥

कहत सुनीन्द्र सुनो हनुमाना । तुमको अंगम सुनाऊ ज्ञाना ॥

तुम्हरे मनमें जो अभिमाना । तजि अभिमान सुनहु तुम ज्ञाना ॥

सत्य पुरुष की कथा सुनाऊँ । अगम अपार भेद बतलाऊँ ॥

सत्यसुकृत की कथा यह भाई । जाकर तुम मर्म नहीं पाई ॥

सत्यपुरुष की कथा अपारा । ताकर तुमही करहु विचारा ॥

ताकी गति तुम जानत नाहीं । जो पुरुष पूरण सब माहीं ॥

काहि की सेवा करहु भाई । सो सब मोहि कहो समझाई ॥

रामचन्द्र कहिये औतारा । परलय जाय सो बारम्बारा ॥

साखी-सेवत है तुम कौन को, करो कौन को जाप ।

सो मोको बतलावहु, कौन तुम्हारो बाप ॥

—खुलना है । आशय है कि, हनुमान नाम अज्ञान विशिष्ट किन्तु विवेकको धारण करनेवाले जीव का है ।

अथवा इसी प्रकार से गुरुमुखद्वारा प्रयत्न आशय जाननेके प्रयत्न करनेवाले को ज्ञान पारखी गुप्त उत्तम रीतिसे समझावेगा तब इन प्रश्नों का आशय समझमें आसक्तता है नहीं तो स्वयम् अभिमानमें मरनेवालोंको सत्यका पथ कदापि नहीं मिलता ।

दोहा—बेद उदीध विन गुरु मुख लखे, सागत लीन समान ।

बाबर गुरुमुख द्वार होय, अमृत सो अधिकान ॥