कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 679, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ११ )
तुरतहि जाउ निर्मल पासा । ताते पुजिहै तुम्हरी आशा ॥
ताके संग जोइ मिलि रहई । ऐसो शब्द दोऊ मिलि कहई ॥
गुरु बचन
श्रवणदास कहि बहु समझाओ । तुम्हरी दरशनको हम आओ ॥
द्वीप सकल हम देखे भाई । सोई छाप मोहि देहु देखाई ॥
गुरु बचन
निर्मल संग यक भँवर रहाई । सोई भौर ले सब भरमाई ॥
निरमल लेके लोकहिं जावे । भरमें जीव को लोक पठावे ॥
इन दोनों कर जाने भेवा । फिर भौसागर होय न खेवा ॥
साखी-अमृत पिआव विचार के, पुरुष नाम कहि देहु ।
बालक लेहु अमराय के, इतना साँच गहि लेहु ॥
चौपाई
पुरुष नाम तुम जानो भाई । हमते काह करहु चतुराई ॥
पुरुष नाम है तुम्हरे पास । तुम्हरे घट में सत्य निवासा ॥
जैसे रहे पुरुषमें बासा । ऐसे पुरुष तुम्हरे पास ॥
एक नाम को अनेक विचारा । जिन जाना तिन उतरे पारा ॥
प्रथम पुरुष अहै यक भावा । दुसरे पुरुष देह धरि आवा ॥
तिसरे पुरुष परफुल्लित नाऊँ । चौथे पुरुष सत्यपुर गाऊँ ॥
गुरु बचन
कहो पुरुष कौन विधि बोले । कैसे के प्रभु सम्पुट खोले ॥
कौन शब्द प्रभु बोलन लीना । कौन भाँति कूर्म सो कीना ॥
कौन यतन अमृत फल लावा । कौन यतन हंस सो पावा ॥
कौन यतन उहाँ पुनि आवा । कौन यतन उन मान धरावा ॥
बारह पालँग कूर्म जो कीन्हा । तेहि ऊपर प्रभु सेज्या दीन्हा ॥
परफुल्लित होय साहिब बोला । उचरी बानी संपुट खोला ॥