सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 673

बाधसागर

( १३ )

सत्गुरु वचन

तब तो ब्रह्मा ध्यान लगावा । तुरतहि गये ब्रह्मके ठावा ॥
ब्रह्मा वचन तब उठा परमाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥
तुम ब्रह्मा गर्व बहु भाखा । ताते जोति छिपाय के राखा ॥
माता ते नहिं अन्तर करते । फिरि फिरि देह सु काहे धरते ॥
ब्रह्मा तवै रहे अरथाई । सन्मुख बात कही नहीं जाई ॥

गरुड वचन

तीनों देव विवस जब भयऊ । देखि गरुड तब बोलन लयऊ ॥
अब जनि भूलो तीनों देवा । आदि पुरुषकी करो तुम सेवा ॥

सत्गुरु वचन

तीनों देव मिलि मंत्र यक कीना । बालक को विदा कै दीना ॥

तीनों देव वचन

सुनु बालक तेरी मृत्यु तुलायी । कौनी शांति कै तोहि जियायी ॥
तुमते कहैं हम वचन प्रकासा । हम जो गये ज्योतिके पास ॥
ज्योतिस्वरूप हम कहा बुझायी । अब तुम बरजहु काल बनायी ॥
तबही ज्योति वचन अस भाखी । यहि बालकको अबको राखी ॥
अवधि तोहार नियरिहोय आयी । अब कोइ राखे राखि न जायी ॥
साखी-हम तीनों को धिग है, जीवन धृग हमार ।
हमसे बालक ना जिये, मिथ्या कीन्ह हँकार ॥
बालक तो जीवै नहीं, मिथ्या जन्म हमार ।
यह चरित्र ना जानिया, केहि करें उपचार ॥

गरुड वचन-चौपाई

जो धिरकार तुम कीन पुकारा । अपने मनमें करहु विचारा ॥
गर्व अभिमान छोड़ु सब भारा । मन अपने तुम मन्मदु हारा ॥
वो तो पुरुष गर्व नहिं भाखे । तुम यम काल अपने शिरराखे ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 673, कुल 2136 में से · SarvaKosh