कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ५७ )
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई । सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने । वेद पढे पर भेद ना जाने ॥
छंद-जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी वने ।
सेवा करै जेहि पुरुषकी सो भक्षण प्रति दिन करै ॥
जानी कै बूझै नहिं केतो कहो समुझाय हो ।
आदि अंत सबै यसै अस निरंजन राय हो ॥
सोरठा-काल सबनको खाय, हरि हर ब्रह्मासे सबै ।
वाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥
धर्मदासवचन-जीपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । हे स्वामी मोहि भेद बताऊ ॥
कैसे आयो यहि संसारा । सो कहिये मोसों ध्यवहारा ॥
साहब कवीर वचन
सत्य युगमें कवीर साहबका पृथ्वी पर प्रगट होना
सुन धर्मनि मै तोहि बताउं । लोक छोड़ि मै इहँवां आउं ॥
सतयुग सत सुकृत मम नाउं । सोई सबै तोहि समझाउं ॥
हंस उवारन आयेउ जबही । मथुरा नगरहि पहुँचे तबही ॥
गुरुमठमांझ जो आसन कीन्ह। रक्षा अंत मोहि काहु न चीन्ह। ॥
कहौं भक्ति बहु भाति हटाई । बिन अंकूर न जीव जगाई ॥
बिबसी नाम रहै इक नांरी । ज्ञानवंत औ वरण कुँमारी ॥
तासों कहो भक्ति परमाना । बिबसी सुनै अचंभौ माना ॥
बिबसी वचन
साखी-अचरज कही तुम स्वामी, लोक वर्ण उजियार ॥
पहिले लोक दिखाओ, पीछे हो इतबार ॥
१ रानी-ऐसा भी पाठ है । २-बिश्वास