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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 570

(१२६)

बीरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥
विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥

पुरुष वचन

आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥
कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥

हंस वचन

मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥
हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥
जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥
साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥
साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥
अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥

साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥
तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥

चौपाई

जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥
सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥
निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥
नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥
जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥
पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥

छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥
पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥