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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 557

बोधसागर

(११३)

कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥
कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥
स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥
सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥
स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥
कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥
राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥
विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥
बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥

राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना

राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥
करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥
धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥
छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥
दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥
अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥
संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥
सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥
वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥

कबीर वचन-चौपाई

करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥
तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥
बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥
जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥