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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 543

बोधसागर

(११)

छड़ीदार वचन

बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन

नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥
छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥
राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥

राजा वचन

राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥

नामदेव वचन

सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥

राजावीरसिंह वचन

श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥

नामदेव वचन

राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥
ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥
माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥
किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥
मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥
काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥
ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥
वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥
आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥
भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥
सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥
हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥