सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 493

बोधसागर

(४९)

धन्य धन्य तुम्ह पण्डित राजू । तुम ब्राह्मण हो का कर काजू ॥
करि अज्ञानतिलक शुठि नीको । कांधजनेउ चाल विनुफीको ॥
उत्तम जाति चालु किमि नीचा । छये चमार तब बालहु सीचा ॥
तोहिँ औ स्वानसो कस भीना । विप्र चमार चालु तुम्ह हीना ॥
पछिली रीति नहिंसमुझहु भेवा । सनकादिक नारद शुकदेवा ॥
किनअसकर्म कीन्ह कछु मोही । द्विजकी चाल न देखौं तोही ॥
हो पण्डित तोहि दया न आई । कैसे परगल काटे भाई ॥
कर्म कसाई विप्र कहावहु । मानुषदेह तुम वादिगैवावहु ॥
सर्वमयी भाषहु भगवाना । केहि गरकाटेहु कहहु सयाना ॥
जीव दया जेहि हृदये नाई । कहैं कबीर सो आहिँ कसाई ॥
गीता भागवत देखु विचारी । जीव दया भाषै बनवारी ॥
जिह्वा स्वाद काज जिव खोवे । जानि बूझि का जनम विगोवे ॥
एक तो भूले गूढ अयाने । तुम्हका दृष्टि देखि बौराने ॥
भूले मूढ जगत्के ज्ञानी । तुमको सृष्टि देखि बौरानी ॥
लाग्यो शब्द सारहियमाहीं । चितगहिपरचे आउ हियमाहीं ॥
तेज हाँड़ पदगहि अकुलायी ।

मोहि अचेत कहैं लियेउ जगायी ॥

सर्वानन्द वचन

मैं भूलेउँ विद्या अभिमाना । अबहिय बेध्यो शब्द सहिदाना ॥
मुख मंजन करि उठे तुरन्ता । पद गहि कहैतबकला अनन्ता ॥
अबमोहि शरणलेहुतुम स्वामी । कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ॥
पुस्तक बहुत आनिधरि आगे । दीन वचन कहि अति अनुगगे ॥
रामानन्द पहुँ तेहि लै गयऊ । गुरुकी दीक्षा ताहि दिवयऊ ॥
भक्ति भेष तिन्ह लीन्हैसि भाई । गुरु ठिगकहहि साधु सेवकाई ॥
गुरुते बिदा मांगि दिन एका । जननी पहुँ कहिचले विवेका ॥