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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 490

(४६)

ज्ञानप्रकाश

औंख कान मुख नाही स्वासा । केहि बिधिमूरति करहिं गरासा ॥
हो पण्डित जनि सुनत रिसाहू । कहो परमारथ शब्द उछाहू ॥
मूरति सरीजव पूजहू ताहीं । इन्ह ते सूछि उहै सुनु आहीं ॥
सरजिव पातीं तोरि तुम आना । सो ले निरजिव पूजा ठाना ॥
हो पंडित तुम आप न चीन्हा । विनु गुरुज्ञान चक्षुबुधि हीना ॥
जग महाँ ब्याह करै जो कोई । आपुते अधिक होय जो सोई ॥
आपुते अधिक मिलै जो नाहीं । तौ निज समन रखो जमिलाई ॥
तुम सर्जीव घट ब्रह्म समायी । कस निजीव अबोल मन लायी ॥
सरजीव होय सरजीव कहीं सेवे । ज्ञानी शब्द परखि हिय लेवे ॥
मैं तोहिं कहो सुनो हो देवा । जिव है अमर अलेक अभेवा ॥
जीव अमर तन विनशे भाई । तन धरि जीव बहुत दुख पाई ॥
अमर नाम जब जीए भेटें । जेहिजन्म मरणको संशय भेटें ॥
अमर नाम खोजहु द्विज राई । जेहिप्रताप यम निकट न आई ॥
अमरनाथ सत्पुरुषको सारा । सत्यपुरुष सत्यलोक मैझारा ॥
अमरलोक सतलोकहि आहीं । तीनि लोक परलैतर जाहीं ॥
कृत्रिम कला नाम धरु जेते । जनमै मरै प्रलयतर भै तेते ॥
जासु चेतना अमर है भाई । तासु नाम अमर सुखदाई ॥
अमर देह सत्पुरुषके आही । वो नहिं आवै गर्भके माही ॥
जो सतगुरु पद रहै समायी । ते हंसा सतलोकहीं जायी ॥
अमर नाम सतगुरुते पावै । सतगुरु अस्थिर ध्यान लखावै ॥
भूत भविष्य जपै नर लोई । सत्यनाम विनु मुक्ति न होई ॥
वरतमान महाँ सतगुरु सारा । सतगुरु भवतारण कैंडिहोरा ॥
जागृत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । जागृत आहि संजीवन सुरिया ॥
जागृत रहै तुरिया सो पावै । स्वप्न सुषुप्ति जग भरमावै ॥
पुरुष विदेह तुरिया अस्थाना । जागृत ब्रह्म देहुमों जाना ॥

१ करणधारका अपभ्रंश है ।