कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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ज्ञानसागर
रघुपति कहैं धनुष मैं मापा । तुम किहि काज करत है दापा ॥
देखि राम भृगुकुल किय रोषा । मारौं शीस जो करौ सरोषा ॥
बिहैंसे राम लखन दोइ भाई । हे द्विज यान करौ सुरमाई ॥
जान बूझि जिन होहु अयाना । मिटै तिमिर ऊगै जब भाना ॥
द्विज कुल देखि किया परमाना । तातैं तुमको भयो अभिमाना ॥
साखी-द्विज कुल धनुष जो आपनो, दीन्ह रामके हाथ ॥
मैं क्षत्री बल भजन, खैंचो हो रघुनाथ ॥
चोपाई
खैंच्यो राम तासु धनु कैसा । तृणहि उठाय लेत हैं जैसा ॥
परशराम गहि ताके पाऊ । क्षमा करो कौशिल्या राऊ ॥
कर प्रणाम भृगु वनहिं सिधारे । रामचन्द्र रहै सभा मझारे ॥
ये जो आहि सो त्रिभुवन राऊ । तिन महि मंडल तेज प्रभाऊ ॥
कहैं सबै हरि को अवतारा । परशुराम औ राम भुवारा ॥
जो निज इच्छा आवत जाई । तौन गर्भ काहे दुख पाई ॥
ऐसा निरंकार परकाशा । सब ते न्यारा सब में बासा ॥
इच्छा कर जस त्रिभुवन राऊ । इच्छा आस कैं निर्माऊ ॥
बाजा लगा जीव जो राखा । ताकी भक्ति सबै मिल भाखा ॥
साखी-कोइ इक ज्ञानी पारखी, परखे खरा औ खोट ।
कहे कबीर तब बाँचि हैं, रही नाम की ओट ॥
चोपाई
राम लखन के सुनो प्रभावा । मिथिलापति एक दूत पठावा ॥
नृप दशरथ बेगहि चलि आहू । राम लखन कर सुनो विवाहू ॥
नृप दशरथ बेगिही चलि आएहू । ऋषिन करायवो तहां विवाहू ॥
चारौं भाइ ब्याह तिहिं पाहीं । बहुत अनँद कीन्ह मन माहीं ॥
चारौं भाई और भुवारा । ले चलि आये अवध मझारा ॥
तहां आइ विप्रन दिय दाना । कछु दिन कियौ सुखराम सुजाना ॥