सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 478

(३४)

ज्ञानप्रकाश

धर्मदास वचन-चौपाई

लेहु दाम धन्य हो तुम माता । एक प्रान देखिये दुइ गाता ॥

रतना वचन

अहौ धर्मदास कसमोल बताओ । उन्हको तन मनवेगि सिधाओ ॥
ओरौ बस्तु लेहु अतुराई । गवनहु वेगि सुनहु गुरु भाई ॥
चलिभै धर्मदास पुनि तबहीं । रतना आकर भाष्यो जबहीं ॥
लीन्हवस्तु पुनि सकल सम्हारी । धनी पहाँ सब जाय सवाँरी ॥
लै साहबके सनमुख राखे । साजुथार अस आयसु भाखे ॥

सतगुरु वचन

चौका सवाँरि थार रचि धरेऊ । सब विधान आज्ञा सम करेऊ ॥
साहेबके पुनि चरण पखारा । चरण पखारि आसन बैठारा ॥
आसन बैठिके सुमिरन कीन्हा । नारियर मोरि अंशगहि लीन्हा ॥
सत्य सुकृत कई मालुम कीन्हा । तब त्रिन तोरिपरवाना दीन्हा ॥
लै नारियर प्रसाद मुख माना । धर्मदास चित हर्ष समाना ॥
प्रेम सहित चरणोदक लीन्हा । मुख महाँ डारि मिठाई दीन्हा ॥
सात दण्डवत तत्क्षण कीन्हा । हृदयमाहिं गुरु रूप गहि लीन्हा ॥
दण्डवत सात धनी कई कीन्हा । शब्दसुरतिपुनिचितगहि लीन्हा ॥
सात दण्डवत कीन्हा जबहीं । माथे हाथ दियौ प्रभु तबहीं ॥
धर्मदास चित हर्ष समाना । उपज्यो हिरदै निरभै ज्ञाना ॥
सद्गुरुकी जब सुरति समानी । विनश्योकरम भरम यमखानी ॥
सद्गुरु पद जबहीं अस्थापा । उदित ज्ञान पद रज परतापा ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब जो आज्ञा कीजे । प्रतिमा मूर्ति काहु कई दीजे ॥
गुरुते अधिक कौन है देवा । अब हम करब तुम्हारी सेवा ॥