कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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विवेकसागर
चौथो सुत संतोष पुनि, हरे सकल जग द्रन्द ॥
पञ्चम पुत्रसु है मुक्ति धाम सुख रूप ॥
छठौ पुत्र पुनि शील है, लक्षण सबै अनूप ॥
धर्म पुत्र भयो सातवों कुलमण्डन अतिधीर ॥
अष्टम सुत बैराग है, मेटै ताप शरीर ॥
विष्णुभक्ति कन्या भयी, लक्षण सब गम्भीर ॥
सुवन सबै निरवृत्तिके, करै मोह उर पीर ॥
ये रानी निवृत्ति के करै, आठ पुत्र अति शूर ॥
भक्ति सुता कुलपोषिनी, करै कुमतिको दूर ॥
अब इनके सुत त्रिय बधू, बरणि कहौं तिन नाम ॥
मुक्ति पंथ अनुकूल सब, पुनि सुख प्रति अभिराम ॥
विवेकपरिवार
रानी रायविवेक की, ब्रह्मसुविद्या नाम ॥
पुत्र ज्ञान आनन्द त्रिय, ता असंग सुखधाम ॥
विचारपरिवार
रानी राय विचार की, निश्चय पूरण काम ॥
पुत्र नेम दृढता बधू, भय मिटै सुखधाम ॥
धीरज की त्रिय है क्षमा, हरे क्रोध को ताप ॥
पुत्र आर्जव गर्व हर, मुदिता बधू अलाप ॥
संतोषपरिवार
तृप्ति नारि संतोष की, जाको सुत आनन्द ॥
करुणा बधू अनूप है, भय मेटै सुखकन्द ॥
सत्यपरिवार
सत्यनारि निज साधुता, सुत निष्कपट उदार ॥
जिज्ञासा ताकी बधू, प्यारी सब परिवार ॥