कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवेकसागर
( ८७ )
साखी-कहै कबीर विवेक दल, अटल ज्ञान दल गाज ॥
अब तो निर्मल होगये, गये मोह दल भाज ॥
सुनहु धर्मनि सत्य विचारा । विना विवेक नहिं उतरे पारा ॥
विना विवेक काल धर खाई । धरि धरि मारे काल कसाई ॥
काल दूत जग फिरे फिरावै । मोह सैन की वृद्धि करावै ॥
जेत महातम जग महाँ होई । काल फन्द जानहु सब सोई ॥
विवेक ही न जीव जग जेते । सुनि सुनि धाय धाय तेहिलेते ॥
विना विवेक पारख नहिं पावै । झूठी आश लगी सो धावै ॥
विना विवेकन न चीन्हे सोई । काल दयाल दोऊ कस होई ॥
विना विवेक काल गुण गावै । बार बार भौ चक्कर जावै ॥
सतगुरु उपदेश जब देही । काल जाल छुडावन लेही ॥
विवेक सागर जो सुनै सुनावै । करै विचार परम पद पावै ॥
निर्मल बुधि अटल गुण गावै । सो हँसा भवजल नहिं आवै ॥
मोह विवेक लड़ाई भारुयो । छुडावन मोह पक्ष नहिं राख्यो ॥
साखी-यह विवेक सागरकथा, करे श्रवण मन लाइ ॥
अद्वुत ज्ञान प्रकाश तेहि, जियत मोक्ष फल पाइ ॥
कहै कबीर धर्मदाससों निर्मल ज्ञान विवेक ॥
जाहि सुने सुख ऊपजे, संशय रहै न नेक ॥
इति श्रीविवेकसागर समाप्त