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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८४ )

विवेकसागर

छांडहु ज्ञान हमारो ठाऊं । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊं ॥
यह सुनिज्ञान मन्त्रयक ठयऊं । फिर विवेक राजा पहुँ गयऊं ॥
राजा मन्त्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥
जो तुम लोभ जीतौ आजू । तौ तुम करो निकंटक राजू ॥
तब बोले मन्त्री प्रकाशा । यहि बिधि होई लोभको नाशा ॥
राजा मन्त्र कियो मन चाही । पुत्र तुम्हारो जीते याही ॥
सो सन्तोष कुवरकर नामा । सो निश्चय जीते संग्रामा ॥
तब राजा बोले सन्तोखा । लोभै जीतौ मिटै सब धोखा ॥
भक्ति ज्ञान तोहि देहुँ सहाई । प्रबल लोभ कहँ जीतहु जाई ॥

लोभ और सन्तोषका युद्ध

इत भौ लोभ उत भौ सन्तोषा । मनसा भूमि उठचो रन रोषा ॥
लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण सन्तोष तेहि मारा ॥
लोभ चलावै धनुष कहँ खैंची । सन्तोष लीन्ह सुमिरनकी ऐंची ॥
चिता शक्ति लोभ पठायी । ज्ञान शक्तिसो निष्फल जायी ॥
अतिदुखफांसीलोभ कर लयऊ । उग्र ज्ञान सन्तोष मिटैऊ ॥
परम सन्ताप लोभ कर लयऊ । सोदया खङ्ग ते निष्फलगयऊ ॥
अचेत शक्ति लोभ चलाई । जागृत शक्ति सन्तोष पठाई ॥
लोभ कहै पैसा तुम लहिये । सन्तोष कहै कहु नहिं चहिये ॥
लोभ कहे नीको है रूपा । सन्तोष कहै छाडि गय भूपा ॥
लोभ कहे लेव कंचन मोरा । सन्तोष कहे जीवन है थोरा ॥
लोभ कहे घोडा जोडा नीका । सन्तोष कहै कारज नहिं जीका ॥
लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । सन्तोष कहे संग नहीं चालू ॥
सांच धनुष कर महि धयऊ । चपल लोभ चापि दल गयऊ ॥
उदासी शक्ति उरमैं उपजायी । कंध्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥
धीरज खङ्ग गह्यो सन्तोखा । बिचल्यो लोभ मिटचो सब धोखा ॥