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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २२ )

ज्ञानसागर

पुहुप लैकर दरशन आएहु । पिता दरश अजहूं नहिं पाएहु ॥
ब्रह्मा कहै कवन तैं आही । मोर मरम पाये किहिं पाही ॥

दर्शन

आदि भवानी मोहि उपजाई । तुमहि लैन को यहां पठाई ॥
चलहु बेगि जिन लावहु बारा । तुम विन सृष्टि न हो अनुसारा ॥
कहे ब्रह्मा कैसे मैं जाऊँ । पिता दरश अजहूं नहिं पाऊँ ॥
एक उपाय चलो सुनु बाता । तौ कहैं बात पूछिहै माता ॥
मोरे हित कह झूठ स्वभाऊ । तौ तुव संग अब धारौं पाऊ ॥
गायत्री कहैं आयसु होई । पुन परमारथ है बड सोई ॥

चौपाई

साखी-चलु ब्रह्मा माता पर, होवै सृष्टि उपाय ॥

झूठ वचन मैं भाषिकै, जाय सुनाइब माय ॥

चलि गायत्री ब्रह्मा साथी । माता प्रेम सौ चूम्यौ माथा ॥
कुशल प्रभाव सौ चूम्यौ शीसा । और मातु दियो बहुत अशीशा ॥
कैसो भयो तहां तोहि भाऊ । सो सब ब्रह्मा मोहि सुनाऊ ॥
ब्रह्मा कहै सुनौ हो माता । यह पूछौं गायत्री बाता ॥
गायत्रिहि आज्ञा भई जवही । अचरज बात कही कलु तबही ॥
परस पुहुप ले पितु ही माथा । देखो सबै रही मैं साथी ॥
आदि भवानी बहुत बिहैंसानी । दोई झूठ कही सहिदानी ॥
ज्येष्ठ पुत्र मम ब्रह्म कुंवारा । बहुत झूठ तिन वचन उचारा ॥
ब्रह्महि शाप दियो तब जानी । होहु अपूज्य कहिआदि भवानी ॥
ओ कमल केतकी अस अविश्वासा । निरघिन ठौर तोर होइ बासा ॥
गायत्री होई वृद्ध भरताग । पांच सात औ बहुत पसारा ॥

साखी-शाप्यो ब्रह्मा गायत्री, फिर पाछे पछताय ॥

क्रोध क्षमा नहिं कोन्हेऊ अबकस करे निरञ्जन राय ॥