कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ८९ )
मन्त्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥
होत सूर्यप्रकाश जेहिक्षण, अन्ध घोर नशावई ॥६२॥
सोरठा-ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ॥
ठाढ़भयी उठिनार, राजा लखि हरषित भयो ॥६५॥
यमदूतवचन
चल्यो दूत तब उहवां जायी । जहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देश रहायी॥
कहे दूत विषतेज न लागा । नाम प्रतापबंध लो भागा ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु सुन हो यम दूता । सेतहि अंग करो तुम पूता ॥
छक करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
कीन्हो दूत सेत सब अंगा । जलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
यमदूतवचन
रानीसों अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मन्त्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौं पिसमानी ॥
तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥
छोड़हु पल्लंग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥
अब हम लेन तोहि कहैं आवा । प्रभुके दर्शन तोहि करावा ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती तब चीन्हेउ रेखा । असकछु साहिब कहेउ विशेषा ॥
तीनों रेख देख चक माहीं । जर्द सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देशा । अब हम चीन्हेउ तुम्हारो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनाई । हंस रूप शोभा किमि पाई ॥
तस हम तोरा रूप निहारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥