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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 215

अनुरागसागर

( ८७ )

दीन्हों शब्द विरहुली ताहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाहीं॥
पुनियम दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र मैं कहों बखानी ॥
छलकर यम आये तुम पासा । सो तुहि भेद कहों परगासा ॥
हंसवर्ण वह रूप बनायी । हमसम ज्ञान तोहि समझायी ॥
तुमसन कहे चीन्ह मोहिरानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल रेख सब देउ बतायी ॥
मस्तक छोट कालकर जानू । चक्षु गुंजनको रंग बखानू ॥
काल लक्ष मैं तोहि बतायी । और अंग सब सेत रहायी ॥

इन्द्रमती वचन

रानी चरण गहे तब धायी । है प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देश आही यमकेरा । लै चलु लोक मिटे झकझोरा ॥
यह तो देश कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देश अमानी ॥

करुणामय वचन

तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥
अब तोर तिनका यमसों दूटा । परिचय भयो सकल भ्रम छूटा ॥
निशिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे यह धर्म लबारा ॥
जब लगि ठेका पूरे नाई । तब लगि रहो नाम लौ लाई ॥

छन्द

सुमरु नाम हमार निशिदिन, काल तो कहैं जब छले ॥
टीका पुरे नाहिं जौलों तौलों जीव नाहीं चले ॥
काल कला प्रचंड देखो, गजरूप धर जग आवई ॥
देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बढ़रि न लावई ॥ ६१ ॥
सो०—गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ॥
रोप रहो तुम ढाल, काल खड़ व्यापे नाहीं ॥ ६४ ॥