कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०५५ )
चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥
तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥
ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥
नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥
चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥
जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥
पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥
बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥
भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥
पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥
छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥
रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥
चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥
रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥
कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥
कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥
भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥
पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥
चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥
सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥
नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥
वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥
रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥
दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥
छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥