कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ८६ )
जेहिविधिजीवनजमठगिराखा । सो सब ताहि सुनायउ भाषा ॥
सुनत ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरण गहे अनुरागा ॥
इन्द्रमती वचन
जोरि पाणि बोली बिलखायी । प्रभु यमते लेहु छुड़ाई ॥
राज पाट सब तुम पर बारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥
कृष्णामय वचन
इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥
चीन्हेउ मोहिं परतीत ददाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥
करहु आरती लेहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥
चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चालु भौ जल जाती ॥
आनहु जो कछु आरती साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥
धन सम्पति तुम यहवों लायी । करहु सन्त सम्मान बनायी ॥
सकल जीव हैं साहिब केरा । मोह वश जिय परें अँधेरा ॥
सब घट पुरुष अंश कियो बासा । यहि प्रगट कहिं गुप्त निवासा ॥
छन्द
सब जीव हैं सतपुरुषका वश, मोह भ्रम विगानहो ॥
यमराजको यह चरित सब, भ्रम जाल जग परधानहो ॥
जिव काल वश लरत मोसे भ्रम वश मोहि चीन्हई ॥
तजिसुधाकीन्होनेह विषसे, छोड़ि घृत अँचवे मही ६० ॥
सो ०-कोइइ कविरला जीव, परसि शब्द मोहि चीन्हई ॥
धाय मिले निज पीव, तजे जारको आसरो ॥ ६३ ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुण बानी ॥